E-Samvaad
(E-Magazine)

Editor- Vivekanand Shukla

Santosh Kumar-I

धम्म कल्याण

विपश्यना साधना

विपश्यना की ध्यान-विधि एक ऐसा सरल एंव कारगर उपाय है जिससे मन को वास्तविक शांति प्राप्त होती है और एक सुखी, उपयोगी जीवन बिताना संभव हो जाता है | विपश्यना का अभिप्राय है जो वस्तु सचमुच जैसी हो, उसे उसी प्रकार जान लेना | आत्म निरीक्षण द्वारा निर्मल करते-करते ऐसा ही होने लगता है | हम अपने अनुभव से जानते है कि हमारा मानस कभी विचलित हो जाता है, कभी हताश तो कभी असंतुलित | इस कारण जब हम व्यथित हो उठते है तब अपनी व्यथा अपने तक सीमित नहीं रखते, दूसरे को बांटने लगते है | निश्चित ही इसे सार्थक जीवन नहीं कह सकते | हम सब चाहते हैं कि हम स्वंय भी सुख-शांति का जीवन जीये और दूसरो को भी ऐसा जीवन जीने दे , पर ऐसा नहीं कर पाते है | अतः प्रश्न यही रह जाता है कि हम कैसे संतुलित जीवन बितायें?
विपश्यना हमें इस योग्य बनाती है कि हम अपने भी शांति एंव सामंजस्य का अनुभव कर सकें | यह चित्त को निर्मल बनाती है | यह चित्त की व्याकुलता और इसके कारणों को भी दूर करती जाती है | यदि कोई इसका अभ्यास करता रहे तो कदम-कदम आगे बढ़ता हुआ अपने मन को विकारो से पूरी तरह मुक्त करके नितान्त विमुक्त अवस्था का साक्षात्कार कर सकता है |

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
विपश्यना भारत की अत्यंत पुरातन ध्यान विधि है | इसे आज से लगभग 2500 वर्ष पूर्व भगवान गौतम बुद्ध ने पुनः खोज निकाला था | उन्होंने अपने साधना के 45 वर्ष जो अभ्यास स्वयं किया और लोगो को करवाया – यह उसका सार है | बुद्ध के समय में बड़ी संख्या में उत्तर भारत के लोग विपश्यना के अभ्यास से अपने अपने दुखों से मुक्त हुए और जीवन के सभी क्षेत्रो में उपलब्धियाँ प्राप्त की | समय के साथ साथ यह ध्यान विधि भारत के पडोसी देशों- वर्मा, लंका , थाईलैंड आदि में फैल गयी और वहाँ पर भी इसके कल्याणकारी परिणाम सामने आये | बुद्ध के परिनिर्वाण के लगभग 500 वर्ष बाद विपश्यना की कल्याणकारी विधि भारत से विलुप्त हो गयी | दुसरे देशो में भी इस विधि की शुद्धता नष्ट हो गयी | केवल वर्मा में इस विधि के प्रति समर्पित आचार्यो की एक कड़ी के कारण यह अपने शुद्ध रूप में कायम रह पायी | इसलिए 2000 वर्षो से वहाँ के निष्ठावान आचार्यों की परम्परा ने पीढ़ी-दर-पीढ़ी इस ध्यान विधि को अपनी अक्षुण्ण रूप में बनाए रखा | इसी परम्परा के प्रख्यात आचार्य श्या जी ऊ ब खिन्न ने लोगो को विपश्यना सिखलाने के लिए सन 1969 में श्री सत्य नारायण गोयनका जी को अधिकृत किया था |
श्री गोयनका जी ने भारत में जुलाई 1969 से विपश्यना शिविर लगाने प्रारम्भ किये | 10 वर्ष बाद उन्होंने विदेशो में भी प्रशिक्षण देना प्रारम्भ कर दिया | पिछले 23 वर्षो में उन्होंने 350 से अधिक 10 दिवसीय विपश्यना शिविरों का आयोजन किया है और 120 से अधिक सहायक आचार्यो को इस योग्य बनाया है कि वे विश्व भर में 1200 से अधिक शिविर लगा पाए है | इसके अतिरिक्त विपश्यना के अभ्यास के लिए 135 केन्द्र स्थापित हो चुके है जिनमे से 70 भारत में तथा शेष 65 अन्य देशो में है | विपश्यना का अनमोल रत्न जो चिरकाल तक वर्मा जैसे छोटे देश में सुरक्षित रहा, अब इसका पुरे संसार में अनेक स्थानों पर लाभ उठाया जा रहा है | आज तो उन लोगो की संख्या बढ़ रही है जिन्हें स्थायी रूप से सुख शांति प्रदान करने वाली इस जीवन कला को सीखने का अवसर मिल रहा है |

अभ्यास
विपश्यना सीखने के लिए यह आवश्यक है कि किसी योग्यता प्राप्त आचार्य के सानिध्य में एक दस दिवसीय आवासीय शिविर में भाग लिया जाये | शिविर के दौरान साधको को शिविर स्थल पर ही रहना होता है और बाहर की दुनिया से संपर्क तोडना होता है | उन्हें पढाई लिखाई से विरत रहना होता है और निजी धार्मिक अनुष्ठानों तथा क्रिया कलापों को स्थगित रखना होता है |उन्हें एक ऐसी दिनचर्या से गुजरना पड़ता है जिसमे दिन में कई बार कुल मिलाकर लगभग 10 घंटे तक बैठे बैठे ध्यान करना होता है | उन्हें मौन का भी पालन करना होता है अर्थात वे अन्य साधको से बातचीत नहीं कर सकते |परन्तु अपने आचार्य के साथ साधना सम्बन्धी प्रश्नों और व्यवस्थापको के साथ भौतिक समस्याओं से बारे में आवश्यकतानुसार बातचीत कर सकते है |
प्रशिक्षण के तीन सोपान होते है | पहला सोपान – साधक उन कार्यों से दूर रहे जिनसे उनकी हनी होती है | इसके लिए वे पंचशील पालन का व्रत लेते है अर्थात जीव हिंसा, चोरी, झूठ बोलना, अब्रह्म्चर्य तथा नशे-पत्ते के सेवन से विरत रहना |इन शीलों का पालन करने से मन इतना शांत हो जाता है कि आगे का काम करना सरल हो जाता है | दूसरा सोपान – पहले साढ़े तीन दिनो तक अपने साँस पर ध्यान केन्द्रित कर, “आनापान” नाम की साधना का अभ्यास करना होता है जिससे बन्दर जैसे मन को नियंत्रित करना सरल हो जाता है |
शुद्ध जीवन जीना और मन को नियंत्रित करना – यह दो सोपान आवश्यक है और लाभकारी भी | परन्तु यदि तीसरा न हो तो यह शिक्षा अधूरी रह जाती है | तीसरा सोपान है – अंतर्मन की गहराइयों में दबे हुए विकारों को दूर कर मन को निर्मल बनाना | यह तीसरा सोपान शिविर के अंतिम साढ़े छह दिनों तक विपश्यना के अभ्यास के रूप में होता है | इसके अंतर्गत साधक अपनी प्रज्ञा जगाकर अपने समूचे कायिक तथा चैतसिक स्कन्धो का भेदन कर पाता है | साधको को दिन में कई बार साधना सम्बन्धी निर्देश दिए जाते है और प्रतिदिन की प्रगति श्री गोयनका जी वाणी में टेप कर सांयकालीन प्रवचन के रूप में जतलाई जाती है | पहले 9 दिन पूर्ण मौन का पालन करना होता है | दसवें दिन साधक बोलना शुरू कर देते है जिससे कि वे फिर बहिर्मुखी हो जाते है | शिविर 11वे दिन प्रातःकाल समाप्त हो जाता है | शिविर का समापन मंगल मैत्री के साथ किया जाता है जिसमें शिविर काल में अर्जित पुण्य का भागीदार सभी प्राणियों को बनाया जाता है |
विपश्यना के शिविर ऐसे व्यक्ति के लिए खुले है, जो ईमानदारी के साथ इस विधि को सीखना चाहे | इसमें कुल, जाति, धर्म अथवा राष्ट्रीयता आड़े नहीं आती | हिन्दू, जैन, मुस्लिम, सिक्ख, बौद्ध, इसाई ,यहूदी तथा अन्य सम्प्रदाय वालों ने बड़ी सफलता पूर्वक विपश्यना का अभ्यास किया है | चूंकि रोग सार्वजनीन है, अतः इसका इलाज भी सार्वजनीन होना चाहिए | उदहारणतया – जब हम क्रुद्ध होते है तो वह क्रोध –‘हिन्दू क्रोध’ अथवा इसाई क्रोध अथवा चीनी क्रोध अथवा अमेरिकन क्रोध नहीं होता है| इसी प्रकार प्रेम तथा करुणा भी समुदाय अथवा पंथ विशेष की बपौती नहीं है |मन की शुद्धता से प्रस्फुइटित होने वाले यह सार्वजानिक मानवीय गुण है | सभी पृष्ठ भूमियों के विपश्यीक साधक जल्दी ही यह अनुभव करने लगते है कि उनके व्यक्तित्व में निखार आ रहा है |

विपश्यना तथा सामाजिक परिवर्तन
विपश्यना की ध्यान-विधि एक ऐसा रास्ता है जो सभी दुखों से छुटकारा दिलाता है | इससे राग, द्वेष और मोह दूर होते है और यही हमारे दुखों का कारण है | जो कोई इसका अभ्यास करते रहते है, थोड़ा - थोड़ा करके अपने दुखों का कारण दूर करते रहते है, और बड़ी दृढता के साथ अपने मानसिक तनावों की जकड़न से बाहर निकल कर सुखी स्वस्थ और सार्थक जीवन जीने लगते है | इस तथ्य की पुष्टि अनेक उदाहरणों से होती है |
विपश्यना विशोधन विन्या्स ने स्वास्थ , शिक्षा, मादक पदार्थो का सेवन तथा संस्थाओं की प्रबन्ध -व्य्वस्थाे जैसे क्षेत्रों में विपश्यना के गुणात्मक प्रभाव के बारे में अन्य उदाहरणों का भी संकलन किया है |
यह प्रयोग इस बात को उजागर करते है कि समाज में परिवर्तन लाने के लिए पहले व्यक्ति को पकड़ना चाहिए, यानि प्रत्येक व्यंक्ति को सुधरना चाहिए | केवल उपदेशों से सामाजिक परिवर्तन नहीं लाया जा सकता है | छात्रों में भी अनुशासन तथा सदाचार केवल किताबी व्याख्यानों से नहीं ढाला जा सकता | केवल दण्डल के भय से अपराधी अच्छे ना‍गरिक नही बन सकते और न ही दंडात्मक मापदण्ड अपनाकर साम्प्रदायिक फूट को दूर किया जाता है | ऐसे प्रयत्‍नों की विफलता से इतिहास भरा पड़ा है |
"व्यक्ति ही कुंजी है " | इसके साथ वात्सल्य एवं करुणा का बर्ताव किया जाना चाहिए | उसे अपने आपकों सुधारने के लिए प्रशिक्षित किया जाना चाहिए | शील सदाचार के नियमों का पालन करवाने के लिए उसे उपदेश नही, बल्कि उसके भीतर अपने आप में परिवर्तन लाने की सच्चीे ललक लगानी चाहिए | उसे सिखलाना चाहिए कि अपने आप खोज-बीन कैसे की जाती है, ताकि एक ऐसी प्रक्रिया हाथ लग जाये, जिससे परिवर्तन का क्रम शुरु होकर चित्तए निर्मल हो सके | इस प्रकार लाया हुआ परिवर्तन ही चिरस्थायी हो सकता है |

विपश्यना साधक केन्द्र

विश्वभर में विपश्यना के केन्द्रा संचालित है | उ0प्र0 में विपश्यना के निम्नलिखित साधक केन्द्र है -
1- धम्म कल्या्ण- कानपुर अंतर्राष्ट्रीय विपश्यना साधना केन्द्र, ढोड़ी घाट, हनुमान मन्दिर के पास गॉव-ऐमा, पोस्टर - रुमा, कानपुर- 209402, फोनः 07388543793, 07388543795, 08995480149,
2- धम्म कल्याण- लखनऊ विपश्यना केन्द्र अस्वी रोड, बक्शी का तालाब, लखनऊ- 227202 फोन नं०- 0522-2968525 मो0- 09794549334
3- धम्म सुबत्थि - जेतवन विपश्यना साधना केन्द्र, श्रावस्ती-271845 फोन नं०- 05252- 265439, मो०- 09335833375
4- धम्म- चक्क्- विपश्यवना साधना केन्द्र खरगीपुर गांव, पोस्टी- पियरी, चौबेपुर, (सारनाथ) वाराणसी फोन नं०-0542-3208168, 0542-3246089, मो0- 09935558100, 09935038801

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